हम जीवन के महाकाव्य हैं
केवल छंद प्रसंग नहीं हैं
कंकड़ पत्थर की धरती है
अपने तो पावों के नीचे
हम कब कहते हैं बंधू , बिछाओ
स्वागत में मखमली गलीचे
रेती पर जो चित्र बनाती, ऐसी रंग - तरंग नहीं हैं
तुमको रास ना आ पाई
क्यों अजात शत्रुता हमारी
छिप छिप कर करते रहे
शीत युद्ध की तुम तैयारी
हम भाड़े के सैनिक लेकर, लड़ते कोई जंग नहीं हैं
कहते कहते हमें मसीहा
तुम लटका देते सलीब पर
हँसे तुम्हारी कूटनीति पर
कूधे अपने नसीब पर
भीतर से जो पोले, हम वे ढोल मृदंग नहीं है
तुम सामूहिक बहिष्कार की
मित्र ! भले योजना बनाओ
जहाँ जहाँ पर लिखा हुआ है
नाम हमारा मिटाओ
जिसकी डोर हाथ तुम्हारे, हम वह कटी पतंग नहीं हैं
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